परमेश्वरका न्याय

और

शाश्वत निर्णय

परिचय

बाइबल पढनेवाले हरेक व्यक्ति इस बात पर विश्वास करते हैं कि परमेश्वर धर्मी परमेश्वर हैं। बाइबल इस बात को बार बार दुहराती है:

ऐसे लोग जो परम्परागत अनन्तकाल के दण्ड की शिक्षा पर विश्वास करते हैं, वे सब विशेषकर परमेश्वर के न्याय पर दृढता से विश्वास करते हैं। उनके लिये पापको दण्ड देना आवश्यक है, क्योंकि वह एक धर्मी परमेश्वर हैं, इनलोगोंका ऐसा कहना है।

आईये, हम न्याय की प्रकृतिपर और गहराई से विचार करें और देखें कि पापियों के अनन्तकाल के कष्टपूर्ण दण्डके लिये यह अनुकुल भी है या नहीं।

बाइबल में न्याय

बाइबल में दण्ड हमेशा किये गये अपराधके अनुपातमें होता था, न कम न बेसी।

मानवीय न्याय

सभ्य समाजमें दण्ड हमेशा ही अपराधके समानुपातिक होता है।

हत्या की सजा मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास होती है।

बलात्कार और हिंसक अपराध के लिये साधारणतया उचित अवधिके लिये कारावास की सजा दी जाती है।

छोटी मोटी चोरी के अपराध के लिये आर्थिक दण्ड या समुदाय में सेवा करने की सजा दी जाती है।

सवारी दुर्घटना से सम्बन्धित साधारण अपराधों में आर्थिक दण्ड दिया जाता है और गम्भिर अपराधों के लिये सवारी चालक अनुमति पत्र या तो निलम्बित कर दिये जाते हैं या फिर रद्द कर दिये जाते हैं।

सम्भावित क्षति से आम जनता की सुरक्षा के लिये और अन्य लोगों को समान अपराध करने से निरुत्साहित करने के लिये दण्ड का प्रावधान आवश्यक है, लेकिन यह हमेशा ही अपराध के समानुपातिक होना चाहिये। तुलनात्मक रुप से छोटे मोटे अपराधों के लिये प्राय: अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जाती है।

परम्परागत शिक्षा

परम्परागत शिक्षा यह कहती है कि जो व्यक्ति अपने पापों को स्वीकार करते हैं और यीशु पर विश्वास करते हैं, उन्हें क्षमा किया जायेगा और वे सब स्वर्ग में आनन्द पूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे, क्योंकि यीशुने उनके पापों का दण्ड अपने उपर ले लिया है, लेकिन परमेश्वर का न्याय ऐसा कहता है कि जो लोग यीशु पर विश्वास नहीं करते, उन्हें अपने पापों की सजा स्वयम् भुगतना पडेगा। उनका कहना है कि बाइबल के अनुसार यह सजा अनन्तकाल तक नर्क में गन्धक से भरे हुए अग्नि कुण्ड में बिताना पडेगा।

परम्परागत शिक्षाके अनुसार सभी विश्वासियों के लिये समान पुरस्कार हैं, स्वर्ग में अनन्तकाल के लिये आशिष। ऐसे लोग जो जीवन भर यीशु पर विश्वास कर उनके रास्ते पर चलते रहे हैं उन्हें भी, ऐसे लोग जो जीवन भर पाप में जी कर अन्तमें मृत्युशय्या पर अपने पापों से पश्चाताप किया है, दोनों के पुरस्कार समान हैं। क्या यह न्याय है?

इसके विपरीत, जिन लोगों ने यीशु पर विश्वास ही नहीं किया है, सभी लोगोंके लिये समान सजा है। कष्ट पूर्ण अनन्तकाल। कुछ लोगों ने लम्बी आयु – ७० वर्ष या ८० वर्ष जी है, कुछ बाल्यावस्था में या युवावस्था में मरे हैं। सबों के लिये समान सजा का प्रावधान, क्या न्याय है?

कुछ थोडे से लोगों ने बहुत ही दुष्ट जीवन व्यतीत किया है और हजारों और कुछ तो लाखों लोगों की मौत के लिये जिम्मदार हैं। कुछ अन्य व्यक्ति अपेक्षाकृत अच्छा जीवन व्यतीत किये हैं, और दूसरों की सहायता भी की है। क्या सभी के लिये समान दण्ड का प्रावधान, न्याय है?

कुछ लोगोंका पालन पोषण स्वतन्त्र देशों में हुआ है, जहां सुसमाचार प्रचार किए जाते हैं और उनके विद्यालयों में बाइबल की शिक्षा दी जाती है, फिरभी उन्होंने यीशुको स्वीकार नहीं किया है। कुछ अन्य लोग हैं जिनका दूसरे धर्मों में पालन पोषण हुआ है, या कम्युनिष्ट विचारधारा के लोग हैं, जिन्होंने शायद ही कभी यीशुका नाम सुना हो। इन सभी को एक समान सजा देना क्या न्याय है?

क्या आपको ऐसा लगता है कि महात्मा गांधी और एडल्फ हिटलर को आनेवाले युगमें समान अनन्त वेदना सहन करना पडेगा?

बाइबल धर्मशास्त्र

क्या बाइबल वास्तव में अविश्वासियों के लिये अनन्त काल के दण्ड की शिक्षाका समर्थन करती है? नहीं, ऐसा नहीं है। ऐसी शिक्षा बाइबल में हिब्रू और ग्रीक वाक्यांशों के गलत अनुवाद का प्रतिफल है।

यद्यपि ‘अनन्त’ शब्द और ‘सदा के लिये’ जो वाक्यांस हैं, अधिकांश हिन्दी बाइबल में उपयोग किये गये हैं, ग्रीक और हिब्रू भाषाओ में ऐसा कोई शब्द नहीं है जिसका अर्थ ‘अनन्त’ या ‘सदा के लिये’ हो। ग्रीक शब्द ‘आयोनियस’ जिसे सभी बाइबल अनुवादों में ‘अनन्त’ अनुवाद किया गया है, वह तो ग्रीक शब्द ‘आयन’ का विशेषण है, जिसका अर्थ ‘एक युग’ होता है। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘एक युग तक’ होता है। इसी प्रकार जिस ग्रीक शब्द का अनुवाद ‘सदा के लिये’ किया गया है, उसका साधारण शाब्दिक अर्थ है ‘युगानु युग’ या ‘युगों तक’।

(Αἰων and עֹלָֽם (olam) और Ever, Eon, Aἰων and Olam आप इन शब्दों के विषय में गहरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यह सभी देखें विश्वव्यापी मिलाप।)

इसी लिये हां, परमेश्वर का न्याय पापियों के लिये दण्ड की व्यवस्था मांगता है। लेकिन न्याय यह भी कहता है कि दण्ड सदा किये गये अपराध के समानुपातिक होना चाहिए।

ऐसा कदापि उचित नहीं है कि इस वर्तमान् संसार में रहते हुए, कितना भी गम्भीर अपराध क्यों न हो, सिमीत अवधी में किये गये पापों के लिये कभी भी अन्त नहीं होने वाले अनन्तकाल तक अति कष्टदायी वेदना को सहन करने की सजा दी जाए। यह भी किसी भी तरह से उचित नहीं लगता है कि एक परमेश्वर जो न्यायी हैं, सभी विश्वासियों को समान पुरस्कार और सभी अविश्वासियों को समान सजा दे सकते हैं।

निष्कर्ष

बाइबल के परम्परागत अनुवादों में ऐसा बताया गया है कि मृत्यु के बाद यीशुके सच्चे विश्वासी स्वर्ग जायेंगे और अनन्तकाल तक आनन्द पूर्ण समय बितायेंगे और अविश्वासी अनन्तकाल तक कभी भी अन्त नहीं होने वाले वेदनापूर्ण समय व्यतीत करेंगे।

बाइबल से प्राप्त यह शिक्षा न्याय के किसी भी स्वरुप से मेल खाता नहीं लगता है। सभी अविश्वासियों के लिये वही अनन्तकाल तक की सजा, उनका जीवन लम्बा था या छोटे समय का था, उनके द्वारा किये गये पाप कर्म छोटे थे या बडे थे, उन्हों ने कभी सुसमाचार सुना था या नहीं, किसी धर्मी परमेश्वरके लिये ऐसा करना पूर्ण असम्भव लगता है।

सत्यता यह है कि ग्रीक या हिब्रू भाषा में ऐसा कोई भी शब्द नहीं है जिसका अर्थ ‘अनन्त’ या ‘सदा के लिये’ हो। अनन्तकाल तक की सजा का जो परम्परागत शिक्षा है वह ग्रीक और हिब्रू शब्दों के गलत अनुवाद पर आधारीत है।

अन्त में, हमें इस प्रश्नको पूछना चाहिये कि ‘समय’ का अर्थ क्या है? परमेश्वर ने सम्पूर्ण भौतिक अवस्था को समय और स्थान के रुप में सृष्टी की। मृत्यु के समय हम भौतिक अवस्था से निकलकर आत्मिक अवस्था में प्रवेश करते हैं। उस अवस्था में, समय से सम्बन्धित शब्द जैसे दिन, महीना, वर्ष आदि जिनका सम्बन्ध इस संसार में सूर्य और चन्द्रमा से है, अपना अर्थ गंवा देते हैं। अनन्त शब्द का अर्थ भी नष्ट हो जाता है। हम उस अदृश्य आत्मिक अवस्था में प्रवेश करते हैं जो हमारे सिमीत भौतिक समझ से परे है। उस अवस्था में परमेश्वर का सिद्ध न्याय पूर्ण रुप से कार्यान्वयन होगा।

अनुवादक - डा पीटर कमलेश्वर सिंह